टेलीग्राफिक संदेश के समान ही है हाइकु लिखना
"टेलीग्राफिक संदेश के समान ही है हाइकु लिखना"
मेरा मानना है कि हाइकु लिखना "टेलीग्राफिक संदेश" भेजने के समान ही है।
मुझे अपने स्कूली दिनों के इंग्लिश के पेपर की याद आ रही है, जिसमें हमें बहुत बड़ा-सा संदेश देकर पूछा जाता था कि इस संदेश को तार के माध्यम से भेजने पर किस प्रकार लिखा जाएगा। बहुत सारे वाक्यों से युक्त संदेश को हमें 2 से 5 शब्दों के अंदर नियोजित करके इस प्रकार लिखना होता था कि सामने वाले तक कम से कम शब्दों में पूरा संदेश इस प्रकार पहुंच जाए कि उन्हें समझ में भी आ जाये और ज्यादा शब्द भी खर्च ना हो। ठीक वैसे ही हाइकु है। सीमित शब्दों में ज्यादा कहना।
जिस तरह तार अथवा टेलीग्राफ के संदेश अत्यधिक महंगे होने की वजह से कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा संदेश लिखे जाते थे, ठीक वैसे ही हाइकु में भी उपलब्ध वर्ण सीमा के भीतर ही पूरी बात कहनी होती है। तार में भेजे गए एक-एक शब्द की बहुत बड़ी कीमत होती थी। इसलिए किसी भी संदेश को इस तरह भेजा जाता था कि वह संदेश कम से कम शब्दों में पूरा का पूरा आ जाए और प्राप्त होने वाले को वह पूरी तरह से समझ में भी आ जाये। हाइकु में भी हरेक शब्द बहुत ज्यादा कीमती होता है।
तार अथवा टेलीग्राफ की यह विशेषता थी कि वे बहुत कम समय के भीतर हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच जाया करते थे और सामने वाले को कम शब्दों में पूरी बात से अवगत करवा देते थे। ठीक वैसे ही हाइकु भी पल भर में पढ़ने वाले के मन के अंदर हजारों किलोमीटर की यात्रा कर लेता है और वह चंद शब्दों में ही पूरे संदेश से अवगत हो जाता है। इसलिए "हाइकु लेखन" तार भेजने के समान ही है।
हाइकु पढ़ने में चंद सेकंड लगते हैं। शायद समझने में कुछ मिनट लग जाएं, लेकिन इसकी भावभूमि सोचने में तो कई घंटे लग जाते हैं। एक हाइकु लिखने में कई बार तो कई-कई दिनों तक शब्दों और भावों की हेराफेरी जारी रहती है। महीनों बीतने और कई तरह के पोस्टमार्टम से गुजरने के बाद एक अच्छा, उत्कृष्ट और हाइकु कहलाने लायक श्रेष्ठ हाइकु तैयार होता है।
हाइकु को "अनुभूति का चरम क्षण" कहा गया है। जहाँ लिखने वाला लिखे जाने वाले संदेश, चित्रण, प्रतीक एवं बिम्बों से एकाकार हो इस तरह घुल-मिल जाता है कि चंद शब्दों में पूरा घटनाक्रम चलचित्र की भांति उपस्थित हो उठता है। तभी एक अच्छे हाइकु का जन्म हो पाता है।
इसलिए हाइकु लिखने से पहले अच्छी तरह सोचें, आप अपने द्वारा दिए जाने वाले संदेश या दृश्य को आत्मसात कर लें, भावभूमि तैयार कर लें, फिर शब्दों का सामंजस्य बैठाकर प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से तीन पूर्णतः स्वतंत्र पंक्तियों में पांच, सात और पांच अक्षरों के वर्ण विन्यास के साथ उत्कृष्ट हाइकु रचें।
हाइकु में तुकांत की अनिवार्यता नहीं है, लेकिन अगर सहज तुकांत हो रहा हो तो लयबद्धता एवं काव्यात्मकता की दृष्टि से यह हाइकु को सुंदरता प्रदान कर सकता है, ऐसा मेरा मानना है।
ध्यान देने योग्य बात है कि एक बड़े वाक्य को 5+7+5 अक्षरों में बांटकर 3 पंक्तियों में विभक्त करके लिख देना हाइकु नहीं होता है।
काव्य में पढ़ने वाले का चमत्कृत होना काव्य को विशिष्टता प्रदान करता है। बिना चमत्कार कोई भी काव्य उत्कृष्टता को प्राप्त नहीं करता है। हाइकु में प्रतीकों, बिम्बों और उपमाओं के माध्यम से चमत्कार किया जा सकता है, जिस से हाइकु में काव्य तत्व के साथ-साथ प्राण तत्व का भी समावेश हो उठेगा।
और हां, एक बात और, हाइकु में आधे अक्षरों को नहीं गिना जाता है। इसलिए बिंदास होकर सभी अच्छे से अच्छे हाइकु रचते रहिए एवं हमारे इस हाइकु संसार को समृद्ध करते रहिए।
सधन्यवाद ....
~ अलंकार आच्छा
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